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महिला वन अधिकारी ने संवारी आदिवासियों की ज़िंदगी

महिला वन अधिकारी ने संवारी आदिवासियों की ज़िंदगी

महिला वन अधिकारी ने संवारी आदिवासियों की ज़िंदगी

हर कोई अपना आज और कल बेहतर बनाने की कवायद में जुटा रहता है, लेकिन दुनिया में कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो सिर्फ अपना ही नहीं, बल्कि दूसरों का भविष्य भी संवारते हैं। ऐसी ही एक महिला है- पी.जी. सुधा, जिन्होंने आदिवासी इलाके में टॉयलेंट बनवाकर उनकी ज़िंदगी बेहतर बनाने की कोशिश की है।

खुले में शौच  से मुक्ति

हमारे देश के दूर-दराज के इलाकों में आज भी लोग खुले में शौच जाने के लिये मज़बूर हैं। प्रधानमंत्री के स्वच्छ भारत अभियान के बाद कई जगहों पर लोग टॉयलेट बनाने के लिये प्रेरित हुये हैं, मगर देश को खुले में शौच मुक्त कराने की मंज़िल अभी दूर है। खैर, केरल के एर्नाकुलम जिले के आदिवासी बहुल जंगली इलाके को यह उपलब्धि मिल चुकी है, वन अधिकारी पी.जी. सुधा की बदौलत। सुधा के प्रयासों से आदिवासी इलाके में 497 टॉयलेट बनाये जा चुके हैं।

आसान नहीं थी राह

एर्नाकुलम जिले के कुट्टमपूजा वन की वन अधिकारी पी.जी. सुधा अन्य महिलाओं से अलग हैं। पहले तो वन अधिकारी बनने का फैसला ही उन्हें लीक से अलग करता है क्योंकि आमतौर पर ऐसे चुनौती और जोखिमपूर्ण काम पुरुषों के ही जिम्मे रहते हैं।

महिला वन अधिकारी ने संवारी आदिवासियों की ज़िंदगी
खुले में शौच जाने से मिली मुक्ति  | इमेज : फाइल इमेज

दूसरा सुधा ने आदिवासियों के कल्याण के लिये जो किया, वह उन्हें आम से बेहद खास महिला बनाता है।

अपनी सरकारी नौकरी की ज़िम्मेदारियों से अलग उन्होंने जंगल में रहने वाले आदिवासियों के जीवन स्तर को सुधारने की कोशिश की और इसी का नतीजा है कि उन्होंने अब तक उनके लिए न सिर्फ 497 टॉयलेट्स बनवायें, बल्कि उन्हें इसका इस्तेमाल करना भी सिखाया। हालांकि यह सब काम सुधा के लिए इतना आसान नहीं था, मगर अपनी ज़िद्द और लगन से उन्होंने मुश्किल काम को भी आसान बना दिया।

सामान ले जाने की दिक्कत

दरअसल, कुट्टमपूजा जंगल गांव-शहर की आबादी से काफी दूर है। इसी वजह से वहां टॉयलेट बनवाने के लिये सामान पहुंचाना बहुत बड़ी चुनौती थी। इस इलाके तक पहुंचने के लिये 15-20 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है, मगर सुधा ने इसका उपाय भी ढूंढ़ लिया। उन्होंने पास बहती नदी के ज़रिये कंस्ट्रक्शन का सामान मंगवाया। हालांकि कई बार ओवरलोड की वजह से नाव डूब भी गई और सामान बर्बाद हो गया, लेकिन सुधा ने हिम्मत नहीं हारी। उनके प्रयासों और मेहनत का ही नतीजा कि उन्हें केरल सरकार की तरफ से नवंबर 2016 में खुले में शौच मुक्ति अभियान के लिए अवॉर्ड मिला था। केरल ऐसा तीसरा राज्य हैं, जिसे खुले में शौच से मुक्ति मिल चुकी है।

पर्यावरण को साफ रखने की चाहत ने ही सुधा को इस नेक काम के लिए प्रेरित किया। सुधा से हर किसी को प्रेरणा लेते हुये अपने आसपास और पर्यावरण की स्वच्छता का ध्यान रखना चाहिये।

और भी पढ़े: कहानी – गलत फैसले लेने से बचें

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